प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी || Moral Stories in Hindi

हेलो दोस्तों ,,, आज मैं आप लोगो के लिए लेकर आया हूँ, प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी का एक ऐसा संग्रह जिसको पड़ने के बाद आपके अंदर नैतिक गुणों का विकाश होगा | नैतिक कहानियो को सुनना बड़े लोगो के साथ साथ बच्चे भी बड़े मन लगाकर सुनते है | तो चलो आज की नैतिक कहानियो की शुरुआत करते है |

प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी


प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी || सच्ची सफलता और विफलता

अजय और विजय दो जुड़वा भाई थे वे दोनों बचपन से एक ही स्कूल में और एक ही कक्षा में पढ़ते थे। जब वह दोनों दसवीं की कक्षा में पढ़ाई कर रहे थे। तब उनकी ही कक्षा में एक रमेश नाम का छात्र था। जो बहुत ही अमीर परिवार से था। एक दिन रमेश अपने जन्मदिन पर बहुत महंगा मोबाइल लेकर स्कूल आया। सभी उसे देखकर बहुत चकित थे। हर कोई उस मोबाइल के बारे में बातें कर रहा था। ओर उसके बारे मैं जानना चाहता था,


कि तभी कक्षा के एक छात्र ने रमेश से पूछा - अरे भाई,,, यह इतना महंगा मोबाइल आपको कैसे और किसने दिया? मेरे भाई, ने मुझे यह मोबाइल गिफ्ट किया है। कल ही वह विदेश से आया है। रमेश अपना मोबाइल दिखाते हुए बोला । विद्यालय की कक्षा में सभी विद्यार्थी उसके भाई की तारीफ करने लगे। हर कोई यही सोच रहा था। कि "काश उनका भी ऐसा कोई भाई होता" अजय भी ऐसा ही सोच रहा था कि "काश हमारा भी कोई ऐसा भाई होता" पर विजय, की सोच थोड़ी अलग थी, उसने कहा "काश मैं भी ऐसा भाड़ा भाई होता" कि मैं अपने छोटे भाई को ऐसे ही महंगी चीजें गिफ्ट कर पाता।

Moral Of The Stories :-

सफलता और असफलता हमारी सोच पर निर्भर करती है। कि हम कैसी सोच रहे हैं। जिस तरह हम सोचेंगे उसी प्रकार हम ढल भी जाएंगे।

लालची व्यापारी || प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहान


व्यापारी ने उस व्यक्ति से अपने बटुए ले लिए। और बटुआ में से सिक्के को निकालकर गिना और गिनते हुए उसने कहा इस बटुए में तो 200 सिक्के रखे थे। मैंने, तुमने सिक्के चुरा ली। और अब ईनाम मांगते हो। दफा हो जाओ, यहां से वरना मैं सिपाहियों को बुला लाऊंगा। इतना ईमानदारी दिखाने के बाद भी व्यर्थ का दोषारोपण उस व्यक्ति से सहन नहीं हुआ। उस व्यक्ति ने बोला- मैंने कुछ नहीं चुराया है। अगर आप बोल रहे हो दरबार जाने के लिए तो मैं दरबार जाने के लिए तैयार हूं। 

दरबार की अदालत में दोनों की बात सुनी गई। और कहा मुझे तुम दोनों पर यकीन है। मैं इंसाफ करूंगा। व्यापारी तुम कहते हो कि तुम्हारे बटुए में 200 सिक्के थे? लेकिन भिखारी को मिले बटुए में सिर्फ 50 सिक्के, इसका मतलब साफ है। कि यह बटुआ तुम्हारा नहीं है। क्योंकि जो बटुआ इस व्यक्ति को मिला है, उस बटुआ का कोई दावेदार नहीं है। इसलिए मैं इनाम में इस व्यक्ति को पूरे 50 सिक्के देता हूं। लालची व्यापारी हाथ मलता रह गया। अब वह चाहकर भी अपने बटुए को अपना नहीं कह सकता था। क्योंकि ऐसा करने पर उसे कड़ी सजा हो जाती।

Moral Of The Stories :-

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है। कि लालच करना बुरी बला है। और हमें लालच नहीं करनी चाहिए। नहीं तो हम अपना चीज भी खो सकते हैं। इस लालची व्यापारी की तरह।

दो चिड़ियों की कहानी || प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी

किसी जंगल में बरगद के एक ऊंचे पेड़ पर एक चिड़िया अपना घोंसला बनाकर रहती थी। उस चिड़िया ने घोसले में 2 अंडे दिए थे। जिसमें से 2 बच्चे बाहर आ गए थे। एक दिन उस जंगल में बहुत जोरदार तूफान आया। और वह बरगद का पेड़ गिर गया। उस बरगद के पेड़ से दबकर चिड़िया की मृत्यु हो गई। लेकिन सौभाग्य से उस चिड़िया की दोनों बच्चे बच गई। उस तूफान की हवाएं इतनी तेज थी, कि चिड़िया के 1 बच्चे को उड़ा कर एक गुफा के पास ले जाकर गिरा दिया। 

जहां पर डाकू रहा करते थे। जबकि दूसरी चिड़िया को हवाओं से दूर उड़ा कर ले गई। और वह ऋषि-मुनियों के आश्रम के पास जाकर गिरा। समय बीतने लगा। और समय के साथ-साथ दोनों बच्चे बड़े होने लगे। कई महीने बीत चुके थे। एक दिन एक राजा जंगल में शिकार करने के लिए निकला और बहुत दूर निकल आया। वह रास्ता भटक गया था । इसलिए वह शिकार करते करते बहुत थक गया। और अंत में राजा एक स्थान पर जाकर अपना घोड़ा रोका और पेड़ की छाया में जाकर आराम करने लगा। 

जिस पेड़ की छाया पर वह आराम कर रहा था। उसके नजदीक में एक गुफा थी। उस गुफा में ही डाकू रहा करते थे। जिस पेड़ के नीचे राजा आराम कर रहा था उसी पेड़ पर बैठी एक चिड़िया बोल पड़ी- जल्दी आओ- जल्दी आओ , इस आदमी के पास ढेरों सारे सोने चांदी के आभूषण है। इसका गला काट कर इसे मार डालो और इसे लूट लो। यह सुनकर राजा हैरान रह गया। और तभी उसे गुफा के अंदर कुछ आहट महसूस हुईं ।गुफा में से डाकुओं को निकलने की आवाज आई। और राजा खतरा भांपते ही वह अपने घोड़े को सरपट दौड़ता हुआ वहां से दूर निकल गया। 

वह घोड़ा दौड़ा- दौड़ा कर थक चुका था। आराम करने वह एक पेड़ के नीचे जा बैठा। पास ही एक आश्रम दिखाई पड़ रहा था। इसके नीचे बैठते ही पेड़ की डाली पर बैठी चिड़िया बोल पड़ी ऋषि बाहर गए हैं। किंतु आप अंदर जाकर आराम करिए कुछ देर में ऋषि आते ही होंगे। राजा ने सिर उठाकर चिड़िया को देखा वह बिल्कुल पहली वाली चिड़िया की तरह दिख रही थी। चिड़िया की बात मानकर राजा आश्रम के अंदर चला गया। 

कुछ देर में ऋषि आश्रम में लौट आए। राजा ने उन्हें प्रणाम किया ऋषि-मुनियों ने राजा के लिए भोजन पानी का प्रबंध किया। भोजन के बाद कुछ देर आराम कर राजा जाने को तैयार हुआ। तो उसने मन में घूम रहा एक सवाल, ऋषि से पूछ- ही लिया गुरुवर,,, आपके आश्रम के सामने स्थित पेड़ पर जैसी चिड़िया है? बिल्कुल वैसी ही एक चिड़िया मैंने कुछ ही दूरी पर स्थित एक गुफा के पास पेड़ पर देखें। 

लेकिन दोनों की बोली में बहुत अंतर था, मैं हैरान हूं कि एक जैसी चिड़िया होने के बाद भी दोनों में इतना अंतर कैसे ऋषि मुनि ने कहा- राजन,,, वे दोनों एक ही चिड़िया से जन्मे थे। और तूफान में बिछड़ गए थे। एक डाकू की गुफा के पास उनके संगत में बड़ी हुई। और उनकी बोली- सीख ली। और एक हम ऋषियों के संगत में बड़ी हुई। और हमारी बोली सीखे सब संगत का खेल है।

Moral of the stories :-

हमारे संगत का हमारे जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। इसलिए जीवन में संगत सोच समझकर बनानी चाहिए। और अच्छे लोगों के साथ ही बनानी चाहिए।

डरपोक पत्थर || प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी

बहुत समय पहले की बात है। एक शिल्पकार मूर्ति बनाने के लिए जंगल में पत्थर की तलाश करने निकला था। वहां उसको एक बहुत ही अच्छा पत्थर मिला। जिसको देखकर वह बहुत खुश हुआ। और वह पत्थर को देखकर बोला - मूर्ति बनाने के लिए यह बहुत ही सुंदर है। जब वह आ रहा था। तो उसको एक और पत्थर मिला उसने उस पत्थर को भी अपने साथ ले लिया। घर जाकर उसने पत्थर को उठाकर अपने औजारों से उस पर कारीगरी करना शुरू कर दिया। 

ओंजारों की चोट जब पत्थर पर हुई। तो वह पत्थर बोलने लगा, कि मुझको छोड़ दो इससे मुझे बहुत दर्द हो रहा है। अगर तुम मुझ पर चोट करोगे, तो मैं बिखर कर अलग हो जाऊंगा। तुम किसी और पत्थर पर मूर्ति बना लो, पत्थर की बात सुनकर शिल्पकार को दया आ गई। उसने पत्थर को छोड़ दिया। और दूसरे पत्थर को लेकर मूर्ति बनाने लगा। वह पत्थर कुछ नहीं बोला - कुछ ही समय में शिल्पकार ने उस पत्थर से बहुत अच्छी भगवान की मूर्ति बना दी। 

गांव के लोग मूर्ति बनने के बाद उसको लेने आए। और मूर्ति लेने के साथ ही उन लोगों ने सोचा नारियल फोड़ने के लिए हम एक और पत्थर ले लेते हैं। जो नारियल फोड़ने की काम आएगी। उन्होंने वहां पर रखे पहले पत्थर को भी अपने साथ ले लिया। मूर्ति को ले जाकर उन्होंने मंदिर में सजा दिया। और उसके सामने उसी पत्थर को रख दिया। अब जब भी कोई व्यक्ति मंदिर में दर्शन करने आता, तो मूर्ति को फूलों से पूजा करता, दूध से स्नान कराता,और उस पत्थर पर नारियल फोड़ता था। 

जब लोग उस पत्थर पर नारियल फोड़ते तो बहुत परेशानी होती थी। उसको बहुत दर्द होता था, और वह चिल्लाता था, लेकिन उसको सुनने वाला कोई नहीं था। उस पत्थर ने मूर्ति बने पत्थर से बात किया, और कहीं कि तुम तो बड़े मजे से हो लोग तो तुम्हारी पूजा करते हैं। तुमको दूध से स्नान कर आते हैं। और लड्डूओ का प्रसाद चढ़ाते हैं। लेकिन मेरी तो किस्मत ही खराब है। मुझ पर लोग नारियल फोड़ कर जाते हैं। इस पर मूर्ति बने पत्थर ने कहा - कि जब शिल्पकार तुम पर कारीगरी कर रहा था, यदि तुम उसको नहीं रोकते, तो आज मेरी जगह तुम होते हैं।

लेकिन तुमने आसान रास्ता चुना, इसलिए अभी तुम दुख उठा रहे हो। उस पत्थर को मूर्ति बने पत्थर की बात समझ में आ गई थी। और उसने कहा- कि अब से मैं भी कोई शिकायत नहीं करूंगा। इसके बाद लोग आकर उस पर नारियल फोड़ते। नारियल टूटने से उस पर भी नारियल का पानी गीरता और मूर्ति को प्रसाद का भोग लगाकर उस पत्थर पर रखने लगे और इस तरह से दोनो की पूजा होने लगी।

Moral of the story :-

हमें कभी भी बुरी परिस्थितियों से घबराना नहीं चाहिए | बुरी परिस्थितियां हमारे सामने आते ही है | हमें तराशने के लिए।

मेहनत पर भरोसा || प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी

अनूप और अनुज दो अच्छे दोस्त थे | वे दोनों एक ही कक्षा में साथ में ही पढ़ाई करते थे | दोनों पढ़ाई में बहुत होशियार थे | पढ़ाई करना उनका पहला काम था, उनकी अन्य चीजों पर वे बाद में ध्यान देते थे | पढ़ाई में उन दोनों का मुकाबला रहता था | कभी अनूप प्रथम आता था, तो कभी अनुज प्रथम आता था | दोनों में यह बताना मुश्किल था कि पढ़ाई में कौन आगे हैं | दोनों को उनके क्लास टीचर पर बहुत चाहते थे, क्लास के सभी बच्चे उन दोनों का बहुत आदर करते थे | क्योंकि वे दोनों पढ़ाई में होशियार होने के साथ ही साथ दयालु और नम्र स्वभाव के थे |

कक्षा नौवीं की परीक्षा हुई दोनों ने जमकर परीक्षा दी परीक्षा का रिजल्ट भी घोषित हुआ | और इस बार का परीक्षा में अनूप तो क्या क्लास के सभी बच्चे और खुद अध्यापक भी हैरान रह गए थे | हर परीक्षाओं में तो अनूप और अनुज लगभग साथ साथ ही रहते थे | मतलब कभी अनूप 5- 10 नंबर से आगे रहता, तो कभी अनुज अनूप से। मगर इस बार ना जाने क्या हुआ, कि अनुज ने अनूप से लगभग 50 अंक से बाजी मार ली थी | परीक्षा के रिजल्ट के बाद दोनों स्कूल से घर लौट रहे थे | 

अनुप अपने मित्र अनुज से कहा -क्यों , अनुज इस बार तो तुम मुझे बहुत पीछे छोड़ गया | मेरा ऐसा भाग्य कहां जो तुम्हारे अंग पा सकूं। नहीं,, अनुप ऐसा तो नहीं मुस्कुराता हुआ | अनुज ने बोला वह अपनी प्रशंसा सुनकर फूला नहीं समा रहा था | मन ही मन उसे अपनी क्लास में सबसे अधिक अंक से पास होने एवं अनूप के द्वारा प्रसंशित होने से अनुज के मन में अभिमान जाग उठा घमंड में अनुज के मन मस्तिष्क पर ऐसा बुरा असर छोड़ा कि वह पढ़ाई से धीरे-धीरे विचलित होने लगा क्लास में जब शिक्षक पढ़ाने लगते तो, वह दूसरे बच्चों से बातें करने लगता। एक दिन शिक्षक भूगोल पढ़ा रहे थे 

| जबकि पंक्ति में बैठे अनुज को बगल के एक लड़के से बातें करते देख शिक्षक ने अनुज को बहुत डांटा और उसे छड़ी से भी पीटा फिर उन्होंने पढ़ाना जारी रखा इस सजा से अनुज का क्लास में बातें करना तो बंद हो गया परंतु पढ़ाई पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा वह घमंड में आकर अनूप से भी कम बोलने लगा। धीरे-धीरे दसवीं की परीक्षा नजदीक आने लगी क्लास के सभी बच्चे जी जान से पढ़ाई करने में लग गई थी | 

अनुज बहुत ही आराम में था क्योंकि उसे पता था कि क्लास में पहले नंबर उससे कोई नहीं छीन सकता है और इस तरह दसवीं की परीक्षा सभी ने दे दी जब 10वीं परीक्षा का रिजल्ट आया तो इस बार अनूप क्लास में सबसे पहले आया था जबकि अनुज का इस बार अपना परीक्षा का रिजल्ट देख कर चौक पड़ा क्योंकि अनुज दसवीं की परीक्षा में फेल हो गया था और इस तरह अनुज को अपनी करनी का फल मिल चुका था।

Moral of the story :-

इस कहानी से हमें सीख मिलती है, कि हमें कभी भी अहंकार नहीं करनी चाहिए। और अपने नम्रता और दयालुता बनाके रखनी चाहिए।

नैकी का फल || प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी

काफी समय पहले की बात है। किसी नगर का राजा विक्रम सिंह बहुत ही क्रूर था। प्रजा अपने निर्दय राजा से बेहत दुःखी थी। खासकर राजा के सेवक तो राजा के अत्याचारों से तंग आ चुके थे। राजा श्यामू सेवक को तो अक्सर छोटी छोटी गलतियों पर सजा दिया करता था | उसे पेट भर भोजन भी नहीं देता था फिर भी श्यामू राजा को खुश करने के लिए अधिक से अधिक परिश्रम करता था | एक दिन राजा ने श्यामू को बिना किसी कारण सौ कोड़ों की सजा सुना दी | अपने इस नारकीम जीवन से श्यामू काफी परेशान हो गया था। एक दिन अवसर पाकर वह जगल में भाग गया।

 भागते भागते वह थक गया था। इसीलिए आराम करने के लिए वह गुफा में घुस गया और लेट गया। कुछ ही समय में नींद ने उसे आ घेरा। तभी अचानक एक आवाज सुन चौक उठा उसने गुफा के बाहर एक शेर को आते हुए देखा दाया पंजा ऊपर उठाए हुऐ था | श्यामू समझ गया, कि उसके पंजे में कोई तकलीफ है | उसने शेर के पास जाकर उसका पंजा अपने हाथ में उठा कर देखा | शेर के पंजे में एक काटा चुभा था | उसने काटा को खींचकर बाहर निकाल दिया, शेर को दर्द से आराम मिल गया | वह श्यामू को कोई हानि पहुंचाए बगैर जगल में चला गया |

एक माह के अंदर ही श्यामू को पकड़ लिया गया | राजा के दरबार में पेश किया गया राजा ने उसे भूखे शेर के आगे डाल देने का दंड सुना दिया | जब श्यामू को दो दिन पहले ही पकडे शेर के कटघरे में डाला गया | तो वहां सैकडो लोगों की भीड़ थी, शेर दौड़कर श्यामू के पास गया, और उसके पैर चाटने लगा | श्यामू भी शेर को पहचान गया शेर के इस व्यवहार को देख श्यामू खुश हुआ | वह वही शेर था, जिसके पंजे से श्यामू ने काटा निकाला था |

शेर ने श्यामू को पहचान लिया, और उसके पैरो को चाटकर उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट की थी। इस घटना का कुर राजा विक्रम सिंह पर गहरा असर पड़ा | श्यामू को कटघरे से बाहर निकाला गया | राजा ने उससे पूछा कि शेर ने उसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया, तब से हम उन्हें जंगल की सारी घटना राजा को बता दी | घटना सुन राजा में में परिवर्तन आ गया | उसने महसूस किया कि शेयर जैसे कुर पशुओ ने भी श्यामू के उपचार के लिए कृतज्ञता प्रकट की हैं, उसे भी अपने सेवकों की सेवाओं की कद्र करनी चाहिए |

और प्रजा को ज्यादा से ज्यादा सुखी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए | उस दिन से राजा दयालु और नेक बन गया, वह अपने सेवकों के साथ नम्रता और त्याग का व्यवहार करने लगा | अब वह सेवकों के कपड़ों भोजन और उनकी तनख्वाह का भी ध्यान रखने लगा, प्रजा को भी सभी करो से मुक्त कर दिया |

Moral Of The Story :-

इस कहानी से हमे सीख मिलती हैं,कि किसी भी जीव जंतु के प्रति अगर आप दयाभाव रखते है। तो वह आपके साथ प्रेम से ही पेश आयेगा। यानी की उपकार के बदले मैं आपको उपकार ही मिलेगा। इसलिए दयालु होना चाहिए।

चूहा और बिल्ली || प्रेरणादायक सुविचार इन हिंदी कहानी

एक घर में बहुत सारे चूहे हो गए थे | वह घर का कीमती सामान को तरबतर कर खराब कर देते थे | घर की मालकिन इन चूहों से बहुत परेशान था 1 दिन इन चूहों से परेशान होकर घर की मालकिन ने बाजार से जाकर एक बिल्ली खरीद लाए, बिल्ली उस घर में आकर बहुत खुश थी, क्योंकि मालकिन उसे सुबह शाम एक एक कटोरा भर कर दूध जो देती थी | क्योंकि मालकिन उसे बिल्ली दिनभर चूहों को मारती और उन्हें खा जाती | इस तरह मालकिन खुश था | उसके दिन भी खूब मौज मस्ती में बीत रहे थे |

लेकिन बिल्ली के आने से चूहे काफी परेशान थे, पहले तो वह निडर होकर घूमते थे, पर अब उन्हें सावधान रहना पड़ता था | बिल्ली के डर से वे सारा दिन अपने बिल में घुसे रहते थे | इससे बिल्ली काफी परेशान थी, एक दिन जब बिल्ली के हाथ एक भी चूहा नहीं लगा, तो वह लकड़ी के एक तख्ते पर बेसुध होकर लौट गई | उसने सोचा कि चूहे, उसे मरा हुआ समझकर उनके पास आएंगे |

और वह उन्हें पकड़ लेगी पर चूहे बिल्ली की चाल समझ गई | और दिल में छुपी रहे शाम को एक चूहा बाहर निकल कर बोला- बिल्ली मौसी हम जानते हैं, कि तुम नाटक कर रही हो, इसलिए हम तुम्हारे पास नहीं आएंगे दिल्ली मायूस होकर सुबह में वहां से उठ गई।

Moral of the story :-

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है | कि किसी भी खतरे को दूर से भाप लेना है कल मंदी है |

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